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Thursday, August 6, 2015

कुछ तो बता

कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी
कुछ मेरी सुन
कुछ अपनी सुना ऐ ज़िन्दगी 

कुछ तो बता ज़िन्दगी 
है कहाँ तू मशरूफ़.... ऐ ज़िन्दगी 

कभी दे अपने घर का पता ऐ ज़िन्दगी 
बैठे करें कहीं कभी गुफ़तगू ऐ ज़िन्दगी 

कभी कुछ वक़्त हमारे साथ भी बिता ...ऐ ज़िन्दगी 

कुछ अपनी सुना 
कुछ हमारी भी सुन ऐ ज़िन्दगी 

छोड़ के कभी इन 
फलसफों और फसानों को 
इस कश्मकश में कभी 
खुद का खुद से तार्रुफ़ करा...ऐ ज़िन्दगी 

कुछ तो बता ऐ ज़िन्दगी....

Sunday, August 10, 2014

मेरा वो बरामदा



आज मेरी उस बरामदे की खिड़की से 
झांकती हुई धूप नहीं दिखती 
आज मेरे उस बरामदे के बाहर 
छाओं का साया है 

आज मेरे उस बरामदे के बाहर 
कोई शोर नहीं सुनाई देता 
आज मेरे उस बरामदे के बाहर 
चिड़ियों की चहचाह ही सुनती है 

आज मेरे उस बरामदे के बाहर 
कोई अनचाही परछाई नहीं आती 
आज मेरे उस बरामदे के बाहर 
खिलखिलाती मुस्कराहट है 

आज शायद उस बरामदे के बाहर 
पहले जैसा कुछ नहीं है 
लेकिन आज जैसा है 
उसमें उदासियों का सबब नहीं है 

वक़्त ही जानता है 
की हमने कुछ खोया 
या हमने पाया है 

अपनों को न छलने 
न दिल दुखाने की राह में 
हमने शायद और वक़्त लगाया है 
सही ग़लत की राह में 
लेकिन खुद को ही पाया है 

आज उस बरामदे के बाहर 
सिसकियाँ नहीं सुनाई देती 

छूटा तो है इन हाथों से कुछ 
वो वक़्त है या 
वो फिसलती हुई रेत का साया है 

बस आज उस बरामदे के बाहर 
एक सुकून भरमाया है 

Wednesday, June 4, 2014

वो एक पत्ती


वो उस शाख़ पर लहलहाती हुई एक पत्ती
वो उस लम्हे मैं क़ैद मेरी ज़िन्दगी

वो उस एक पत्ती पर अटकी हुई मेरी ज़िन्दगी
वो अधूरी दास्तां की मुक़म्मल ज़िन्दगी

वो बिना अस्तित्व के बिखरी हुई ज़िन्दगी
वो नीरसता में रंग भरती हुई पत्ती


वो कुछ न हो के भी वजूद से भरी
वो ज़िन्दगी को एक आस देती हुई कुछ सूखी, कुछ महकी सी पत्ती

वो ज़िन्दगी को ज़िन्दगी का रुख़ देती हुई
वो उस शाख़ पर अकेली लटकती हुई एक पत्ती


Tuesday, May 20, 2014

काश मैं यह कर पाऊं


जी मैं आता है यहाँ से पंछी बन के उड़ जाऊं 
पंख फैलाये अपने मैं
खुले आसमान में उडती जाऊं 

न हो कोई दीवार, न हो कोई बंधन 
न हो कोई फ़िक्र, न हो कोई उलझन 

जी मैं आता है यहाँ से पंछी बन के उड़ जाऊं 
खुले गगन के तले में 
दूर दूर तक घूम के आऊँ 

न हो कोई भाषा की रोक, न हो कोई रस्मों की टोक 
नीले उस अम्बर के नीचे, बस उडती जाऊं 

जी मैं आता है यहाँ से पंछी बन के उड़ जाऊं 
जहाँ चाहे जी मेरा, वहां पहुँच जाऊं 
जैसे चाहे जी मेरा, वैसा देस बनाऊं


न हो कोई बंदिशें, न हो कोई मुश्किलें 
जब जी चाहे, जो जी चाहे बस वो कर जाऊं 

जी मैं आता है यहाँ से पंछी बन के उड़ जाऊं 
आज़ाद गगन की छाओं में 
अपने पंख फैलाऊं

जब जी चाहे, जो जी चाहे बस वो कर जाऊं 
जी मैं आता है यहाँ से पंछी बन के उड़ जाऊं 

Freedom of womankind

Though it was formally banned in December 1829, under the Bengal Presidency by Lord William Bentinck; the free India still holds its deeper...